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Jan 3, 2011

Shayad Jeet Jaaun..Shayad Haar Jaaun

शायद जीत जाऊं ......शायद हार जाऊं
शायद जीत जाऊं 
शायद हार जाऊं
मन में ऐसी कौन सी रीत लाऊं 
दुःख के आँचल मे कौन सा मीत लाऊं
मै खुश थी अपने अरमानो के आशियाने मे
बस सोचती और कितने अपने पर फैलाऊं
मुझे दिखते मेरे आसमान के और कैसे करीब जाऊं

शायद जीत जाऊं 
शायद हार जाऊं
मन में ऐसी कौन सी रीत लाऊं 
मन की उडती धूल को किन बूंदों ने बैठा दिया
अब शायद ही मेरा रास्ता मै तो ढूंढ़ पाऊँ
कुछ टूट कर बिखरता सा मेरी आँखों से बह गया
कुछ दर्द मे सिमटता सा कहीं आह मे रह गया
मेरी कोशिश के पर है अभी ठन्डी बर्फ जैसे 
डर है मुझे की दर्द की तपिश मे कहीं गल के ना रह जाऊं
मुझे दिखते मेरे आसमान के और कैसे करीब जाऊं
अंतर्वेदना मेरे मन की 
अंतर्द्वंद मेरे जेहन की
शायद जीत जाऊं 
शायद हार जाऊं
मन में ऐसी कौन सी रीत लाऊं 
दुःख के आँचल मे कौन सा मीत लाऊं


(all of us have dreams and we all face tough moments in life following our dreams, here the poem says the same how the ups and downs come in life , we get tear in eyes and pain but never allow tear of heart in follow up of our dream becoz we all love it more than anything else. We keep follow up of our dreams ready to face face unknown hurdles and obstacles)