अपनी हंडिया की गर्मी से वो मूंगफली खिला रहा था!
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कोहरा और ठण्ड और रास्ते का किनारा !
मूंगफली वाला बैठा ताके हर राही का सहारा !
अपनी मूंगफली पर बिचारा इतराता कैसे !
कुहरे की धुंध मे, हंडिया के धुंवे से, राही मे चाव जगाता कैसे!
माटी की खुशबू मे खूब भूंजी है, टुकुर टुकुर बतला रहा था!
चाउमीन वाला चीन की तरह जोर तरक्की दिखला रहा था!
दोनों नरम थी, दोनों गरम थी, दोनों सड़क पर थी आमने सामने !
बदला चस्का और चाव स्वाद का आज समय ये उसको जता रहा था !
वही काढ़ाही , वही आग, वही दोनों गरीब
पर चाउमीन वाले की भरी गरम जेब
मूंगफली वाले की भरी गरम डलिया को जाते जाते ठेंगा दिखा रहा था!
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